Friday, May 1, 2020

कामगार दिन - देश तरक्की की रक्त वाहिनी ड्राइवर शापित कामगार !



शापित कामगार देश की रक्त वाहिनी ड्राइव्हर, देश के तरक्की के लिए वरदान है! क्या किसको हो सकता भला इनकार है ?


          १ मे दुनियाभर में जागतिक कामगारदिन मनाया जाता है.जब औद्योगिक क्रांति का आगाज हुआ,तो मजदूर एक जरूरत बडी जरूरत बनने लगी थी.जैसे जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में तरक्की होने लगी मजदूरो की भी जरूरत कारखानदारो को पडने लगी. औद्योगिक क्रांति के बाद कारखानदारी बड़ी साथ ही रोजनदारी भी बढने लगी. मजदूरों से कम दाम में १२घंटे या  १४ घंटे काम लिया जाने लगा.काम के आठ घंटे का किया जाये,रातमें और खतरोसे भरे कामो के लिए खास नियम बनाये जाये. काम के दाम नगद चाहिये, बाल मजदूरो पर पाबंदी हो,महिला मजदूर के कामोपर मर्यादा हो,हफ्ते की छुट्टी दी जाये.कारखानेदार मजदूरों की मांगें मानने को तैयार नही थे.इसीकारण मज़दूरोने बड़े आंदोलन खड़े कर दिये थे,.जिसमे अपने प्राणों की आहुति भी कई मज़दूरोने दी थी.मजदूर संघटनो ने दो आंतरराष्ट्रीय सम्मेलन लिए.१८९१ से १ मे आंतरराष्ट्रीय मजदूर दिन दुनिया के अलग अलग देशों में मनाया जाने लगा.भारत देशमें १ मे १९२३ से मजदूर दिन मनाया जाने लगा.साथ ही केरल और महाराष्ट्रमें ईन राज्योके निर्मिती के कारण केरला दिन और महाराष्ट्र दिनभी मनाया जाता है.
           हम हमारे देश के मजदूरों में ख़ासकर ड्राईवर की गर बात करे तो,जो देश के लिए रक्तवाहिनियों की तरह हो कर भी शापित सा क्यों है ? ये सवाल मन मे घर कर जाता है.औद्योगिक क्षेत्रमे ट्रांसपोर्ट सबसे अहम बात होती है और ट्रांसपोटेशन की रूह असल मे ड्राइवर ही होता है.ट्रांसपोर्ट में अंतर (डिस्टेन्स) और वक्त (टाइम) की कोई लिमिट ड्राइवर की नोकरी में नही होता.ड्राइवर के काम दिनरात और खतरोसे भरे होते है.देशमे औद्योगिकक्षेत्र नित नयी देशी विदेशी कंपनीयों पिछले कई दशकोसे बढी है.स्वाभाविक है कि ट्रांस्पोर्टटेशन भी बडा है,तो ड्राइवर पेशेकी जरुरत भी बड़ी है.इनसब के बावजूद ड्राइवरों की हालात हालातभरे ही है.इस बात से कोई इनकार नही करता.
          मुझे याद है, एक रोज मै हमारे शहर से बाहर इंद्रायणी होटल के पास  नींम के छाव में खड़ा हुआ था,सामने ही हाई वे पर  मोटरसाइकिल पर सवार दो नवजवानोंने ट्रकवाले को रोका और ट्रक के गुसकर मारने लगे. मै दूर से देख रहा था.बात समझमे नही आयी.साथ ही मैं शहर की तरफ निकल पड़ा.लगभग दो घंटे के बाद में चांदनी चौक में वही नवजवान उसी मोटरसाइकिल पर फिर एक ट्रकवालेको रास्ते के साइड में  रोककर ट्रक में चढते दिखायी दिये.

           मेरे मनमें शंका जागी. मैंने ट्रक का नंबर देखा, तो राजस्थान की ट्रक थी. मोटर -साइकिल पर नजर डाली तो नंबरप्लेट हाथसे टेडी करी हूई थी.ट्रक के केबिन के जा कर मैंने आवाज लगाई,देखा तो ड्राइवर को वो मार रहे थे और दो हजार रुपये की मोटर -साइकिल के नुकसान की मांग कर रहे थे.मेरी आवाज सुन नीचे उतरे और मुझसे कहने लगे,देखो चाचा इस ट्रकवाले टक्कर मारी,सुनते ही मैंने नवजवानों को दो दो झापडे जड़ डाली. यह याद दिलाकर के कुछ देर पहले इंद्रायणी होटल के सामने हाइवे पर भी ट्रक ड्राइवर को लूटा और यहाभी लूट रहे हो.बात अब के बड़ी अजीब थी.चौक में ट्राफिक पुलिस थी, रहदारी भी थी और ट्रक ड्राइवर की लूट हो रही थी.किसको खबर तक नही थी. ये इत्तेफाक ही था कि, मेरी दोनो वक्त नजर पडी. ऐसा रोज कई बार ड्राइवरो की लूट होती है, और मार भी खानी पड़ती है.
पुलिस और ड्राइवर के रिश्ते के किस्से यूनिवर्सिटी में इस सबजेक्ट को लेकर पीएचडी की जा सकती है. रास्ते पर बहोत ट्राफिक लगभग जाम थी.जिसमे एक लोडिंग ट्रक ट्राफिक पुलिस को दिखायी दिया. इनती सारी भीड़ में उसे रास्ते से बाजू रुकवाने को इशारे सीटियाँ फूक फूंककर करने लगा.ट्राफिक से ट्रक बाहर निकालना मुश्किल था.इसलिए ट्रक ड्राइवर धीरे धीरे ट्रक को आगे लिए जा रहा था.ताके ट्राफिक और जाम ना हो जाये.साथ ही चढान के वजह से ट्रक को रुकना ना मुमकीन था.ये मैं इसलिए जानता क्योंकि ट्रक के पीछे मैं भी ट्राफिक ने फंसा हुआ था.लगभग आधा किलोमीटर पर जाकर ट्रक ड्राइवरने रास्ते के साइड में लेकर ट्रक रुकवाई और ग़ुस्सेमे आकार बिना किसी सोंचे समझे हाथ के दंडे से ताकत से ट्रक के रग्गिल कांच (आसानीसे न फुटनेवाली) पर मारा के ट्रक की कांच टूट गयी. क्या कसूर था ट्रक ड्राइवर का ? रास्तेपर जब तक स्टेरिंग पर बैठा होता है.हर घटना का जिम्मेदार होता है.शिकायत किससे करे थानेदार के नजरमें भी गुनाहगार ड्राइवर ही होता है.
          एक हादसा ये भी हुआ था.सतरा साल का लड़का रात मोटरसाइकिल स्पीड अनकंट्रोलOOOOOO होनेपर डिवाइडर से टकराकर उछलकर दूसरे साइड गिर पड़ा सामने से आनेवाली ट्रक के निचे कुचल पड़ा. भिड़ने ट्रक को आग लगाई और ड्राइवर को मार डाला.अतिश्रम ड्रायविंग में ऑक्सीडेंट में जान चलीO जाती है, तब ये देखता और सुनता हूँ,तो ट्रक मालिक की हमदर्दी भी मिलती शिवाय इल्जाम के घरवाली बेवा होती है और बच्चे यतीम होते है. असंगठित होने के कारण ना कोई फंड, ना, ग्रजयूटी, विमा के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते है.अपाहिज होने पर सिवाय ऊपरवाले के कोई मददगार नही होता.
बहोत बार ड्राइवर पेशेसे बाहर निकलने की कोशिश करता,एक्के दुक्के निकल जाते है.लेकिन बहोत सारोको बढ़ती बेरोजगारी की मजबूरी के कारण फिरसे स्टेरिंग पर बैठना पड़ता. शापित ड्राइवर को इसलिए कहना पड़ता है. गाँव से लेकर शहर तक देशभर में सबसे ज्यादा तादाद उन्ही की है.और सबसे ज्यादा पीड़ित पेशा ड्राइवर का है.
यही शापित पेशा देश के तरक्की के लिए हम सब के लिए वरदान भी है. देश के हर घरमे  बेटा, भाई, बाप,चाचा, मामा कोई ना कोई करीबी रिश्तेदार ड्राईवर है, फिर भी हम कहा कद्रदान है.
देश के सारे ड्राइवरों को न्यूज व्हलुज का कामगार दिन पर सलाम हैं और ढेर सारे  हार्दिक हार्दिक शुभेच्छा


अफजल सय्यद,
एडिटर,न्यूज व्हलुज

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